हमारी पहचान पर हमला: सोशल इंजीनियरिंग का एजेंडा Exposed!
यह मैंने बहुत पहले कहा था कि आज चाहे टिकैत, संजीव बाल्यान की भाषा हो, या मुकेश भाखर जैसी ICM शादी को मुख्यधारा की मीडिया में हाईलाइट करना हो, या फिर हेरोपंती जैसी फ़िल्मों के मार्फ़त नस्ली नरसंहार करने की कोशिश हो, या सत्यमेव जयते जैसे प्रोग्राम में सामुदायिक संस्थानों पर हमला करना हो — इनके दिशा-निर्देश कहाँ से तय हो रहे हैं। आप लोगों को, प्लेटो की Allegory of the Cave याद है? गुफा में बंद क़ैदियों को दीवार पर सिर्फ़ परछाइयाँ दिखती हैं और वे उन्हें ही सच्चाई मान लेते हैं। आज का भारत भी उसी गुफा में क़ैद है — मीडिया, प्रोपगैंडा और संस्थाओं के ज़रिए सिर्फ़ वही नैरेटिव दिखाया जा रहा है, जो कुछ लोग चाहते हैं। RSS और उसके इशारे पर चलने वाले लोग स्टेट इंस्टीट्यूशंस को हाईजैक करके लोगों के निजी मामलों में दख़लअंदाज़ी कर रहे हैं। उनका मक़सद है समाज को अपने राजनीतिक एजेंडे के हिसाब से सोशल इंजीनियर करना। क्षेत्रीय विविधता, लोकल कल्चर, जातीय और सामुदायिक पहचान को ख़त्म कर दो — ताकि कोई टोकने वाला न रहे और वे आराम से राज कर सकें। *ये कल्चरल जेनोसाइड नहीं तो और क्या है?* हर जगह इंटरकास्ट मैरिज को...