हमारी पहचान पर हमला: सोशल इंजीनियरिंग का एजेंडा Exposed!
यह मैंने बहुत पहले कहा था कि आज चाहे टिकैत, संजीव बाल्यान की भाषा हो, या मुकेश भाखर जैसी ICM शादी को मुख्यधारा की मीडिया में हाईलाइट करना हो, या फिर हेरोपंती जैसी फ़िल्मों के मार्फ़त नस्ली नरसंहार करने की कोशिश हो, या सत्यमेव जयते जैसे प्रोग्राम में सामुदायिक संस्थानों पर हमला करना हो — इनके दिशा-निर्देश कहाँ से तय हो रहे हैं।
आप लोगों को, प्लेटो की Allegory of the Cave याद है? गुफा में बंद क़ैदियों को दीवार पर सिर्फ़ परछाइयाँ दिखती हैं और वे उन्हें ही सच्चाई मान लेते हैं। आज का भारत भी उसी गुफा में क़ैद है — मीडिया, प्रोपगैंडा और संस्थाओं के ज़रिए सिर्फ़ वही नैरेटिव दिखाया जा रहा है, जो कुछ लोग चाहते हैं।
RSS और उसके इशारे पर चलने वाले लोग स्टेट इंस्टीट्यूशंस को हाईजैक करके लोगों के निजी मामलों में दख़लअंदाज़ी कर रहे हैं। उनका मक़सद है समाज को अपने राजनीतिक एजेंडे के हिसाब से सोशल इंजीनियर करना। क्षेत्रीय विविधता, लोकल कल्चर, जातीय और सामुदायिक पहचान को ख़त्म कर दो — ताकि कोई टोकने वाला न रहे और वे आराम से राज कर सकें।
*ये कल्चरल जेनोसाइड नहीं तो और क्या है?*
हर जगह इंटरकास्ट मैरिज को जबरन प्रमोट किया जा रहा है। बॉलीवुड की हेरोपंती, आमिर ख़ान का सत्यमेव जयते — सब RSS-BJP के एजेंडे का हिस्सा हैं। जाट समुदाय जैसे मज़बूत लोकल ग्रुप्स को टारगेट किया गया।
प्रभावशाली लोगों की इंटरकास्ट शादियों को सोशल मीडिया पर स्पॉन्सर करके हाईलाइट करना, जाट लीडर्स (टिकैत, संजीव बाल्यान, राजाराम मील आदि) पर दबाव — ये सब प्लान्ड है।
*एजेंडा साफ़ है:*
ट्रेडिशनल आइडेंटिटी ख़त्म करो, रूटलेस, docile आबादी तैयार करो, जो आसानी से कंट्रोल हो सके। लोकल प्रेशर ग्रुप्स को तोड़कर ज़मीनें हथियाओ।
*भारत में ख़तरनाक पैटर्न देखो:*
★मैरिटल रेप को लीगलाइज़ करने की कोशिश
★एज ऑफ़ कंसेंट 16 तक घटाओ
★लड़कियों की मैरिज एज 21 कर दो (मतलब 16 से फ़िज़िकल रिलेशन, 21 पर शादी)
★इंटरकास्ट और इंटर-रीजनल मैरिज प्रमोट करो (कुछ लोग तो same-caste matrimony पर बैन की बात कर रहे हैं)
★इन परेशान शादियों से डिवोर्स, सिंगल मदर्स, “रूटलेस” बच्चे
★मेट्रो शहरों में ब्रोकन रिलेशनशिप → रिलेशनशिप कोचेस का स्कैम बिज़नेस
★ट्रेडिशनल कम्यूनल आइडेंटिटी ख़त्म → रूटलेस, मेंटली अनस्टेबल “मॉन्ग्रेल” जेनरेशन
★एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर्स को नॉर्मलाइज़ करो (“वाइफ़ प्रॉपर्टी नहीं है”)
★पहले हालात ऐसे बनाओ कि तलाक़ होने लगे, फिर डिवोर्स को इतना महँगा और जटिल बना दो कि लोग शादी से ही दूर भागने लगें
★शादी का विकल्प लिव-इन और ओपन रिलेशनशिप को बना दो
★इंग्लिश अख़बारों में “humans are naturally promiscuous” वाले आर्टिकल — सब ट्रेडिशनल फ़ैमिली को डिस्ट्रॉय करने के लिए
यह पूर्णतः अव्यवस्था है। राज्य और उसकी संस्थाएँ समाज तथा उसकी परंपराओं को संभालने में विफल हो रही हैं।
ट्रेडिशंस वे एक्सपेरिमेंट हैं, जो हज़ारों साल तक रिफ़ाइन हुए हैं। वे tried, tested और सफल थे। उन्हें सिस्टेमैटिक तरीक़े से नष्ट किया जा रहा है। हरियाणा में डोमिसाइल आसानी से, डेमोग्राफ़ी चेंज, कल्चर बदलो या इलाक़े की आबादी बदल दो — ये उनका तरीक़ा है।
*हेरिटेज के नाम पर ताजमहल, नेशनल पार्क बचाते हैं, लेकिन living cultures को मारने की कोशिश!*
ये लोग सबको “डिफ़ॉल्ट हिंदू” बनाना चाहते हैं, चाहे कोई ख़ुद को हिंदू न माने। कल्चर नहीं बदल सके तो डेमोग्राफ़ी बदल दो। इन्हें बिना किसी विरोध के राज चाहिए।
RSS तो हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों तक को नहीं मानती, जब इंटरकास्ट को प्रमोट कर रही है। ये अपने हिसाब से समाज बनाकर उसे मुसलमानों और माइनॉरिटी के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना चाहते हैं। तभी तो “हिंदू ख़तरे में है” का प्रोपगैंडा चलाते रहते हैं।
असल प्रॉब्लम यह है कि भारतीय समुदाय, समाज, सामाजिक संस्थान, धर्म और कल्चरल वैल्यूज़ — सबको सिर्फ़ राजनीतिक बेनिफिट्स के मार्फ़त देखने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है — क्या अब शादी भी पॉलिटिक्स के लिए होगी? क्या पॉलिटिकल एजेंडा तय करेगा कि शादी कहाँ और कैसे करनी चाहिए?
जाटों को इस गुफा से बाहर निकलना होगा। स्वतंत्र सोच विकसित करो, multiple sources से verify करो, लोकल कम्युनिटी मज़बूत बनाओ, ट्रेडिशंस को blindly reject मत करो। Centralized सोशल इंजीनियरिंग हमें सिर्फ़ ग़ुलाम बना सकती है। अपनी पहचान, अपनी संस्कृति, अपनी क्षेत्रीय विरासत — बचाओ, वरना बाद में पछताओगे!

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